हिंदुस्तान गर्मी में पिघल रहा है, और महाराज महल से आवाज़ देते हैं कि प्याज रख लो

by Abhay Tomar

4/28/20261 मिनट पढ़ें

हिंदुस्तान में 1971 में 26th संविधान संशोधन आया और राजा-महाराजाओं के दौर को रोककर उनकी उपाधियाँ छीन ली गईं, प्रिवी पर्स खत्म कर दिया गया, और लोकतंत्र ने घोषणा कर दी कि अब कोई “महाराज” नहीं रहेगा। लेकिन हर प्रदेश के हर दूसरे चार-सात जिले मिलाकर एक महाराजा तो मिल ही जाएंगे, ऐसे ही एक महाराजा हैं. ग्वालियर के ऐसे ही एक चेहरे हैं ज्योतिरादित्य एम. सिंधिया, जिन्होंने भीषण गर्मी से जूझते लोगों को सलाह दी कि अपने पास प्याज रखिए। उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे खुद न गाड़ी में एसी चलाते हैं, न कमरे में।

अप्रैल का महीना है, दुनिया के 100 शहरों में हिंदुस्तान का तकरीबन हर शहर है और महाराज कहते हैं कि जेब में प्याज रखिए, लू से बच जाएंगे। महाराज की यह सलाह सुनते ही उनके हुदूकचुल्लू समर्थक खुश ही गए हालांकि महाराज खुद 4500 करोड़ के बँगले में रहते हैं जिसमें सिर्फ चार सौ कमरे हैं, जिसकी दीवारों में इतिहास बंद है लेकिन महाराजा के हर कमरे में एक प्याज रखी है, ग्वालियर में कल का तापमान 43 डिग्री से ऊपर निकल गया, महाराजा के शहर में बिजली की कटौती हुई, लोगों ने गाली दी लेकिन महाराज ने सबको प्याज नहीं दी, क्यूँ, मुझे नहीं मालूम!

महाराज की यह सलाह उन तमाम सलाहों की तरह है जिसमें हर बड़ी समस्या को छोटा करके दिखाते है, ताकि उसे हल करने की जिम्मेदारी से बचा जा सके। जैसे कह रहे हों "समस्या तुम्हारी है, समाधान भी तुम्हीं ढूँढो"। हम बस तुम्हें एक प्याज दे सकते हैं। महाराज का महल भी कभी मजदूरों ने बनाया था, उन मजदूरों ने, जो बिना एसी, बिना कूलर, बिना किसी “नुस्खे” के, धूप में खड़े होकर पत्थर ढोते रहे। तब उनके पास प्याज था या नहीं लेकिन मुझे नहीं मालूम लेकिन आधुनिकता इस दौर में आज उन मज़दूरों के वंशजों को सलाह दी जा रही है “प्याज रख लो", तुम्हारे पूर्वज़ों ने भी यही किआ था.

हिंदुस्तान में पिछले दो दशकों में हजारों लोग गर्मी से मारे गए, कई आंकड़े 17,000 से 20,000 के बीच की मौतों की बात करते हैं। दुनिया भर में हीट वेव से होने वाली मौतों में भारत की हिस्सेदारी लगभग पाँच में एक है। यानी हर पाँचवीं मौत यहाँ होती है। यह कोई देहाती समस्या नहीं है, यह एक राष्ट्रीय आपदा है। लेकिन इसका समाधान क्या है? नीति? योजना? इंफ्रास्ट्रक्चर? नहीं, बस प्याज।

सोचिए एक डिलीवरी बॉय दिल्ली की सड़कों पर दोपहर के 2 बजे, 45 डिग्री तापमान में , सड़क के कंक्रीट से निकलती गर्मी से बीमार हुआ एक लड़का और उसी समय महाराज उसे सलाह दे जाएं “जेब में प्याज रख लेते तो ऐसा नहीं होता।” यह हर उस आदमी के संघर्ष का अपमान होता जो दिन की धूप में अपनी रोज़ी रोटी की कमाई करते हुए अपना जीवन गुज़ार देता है.

याद आता है Harishankar Parsai का व्यंग्य—भूखा आदमी सड़क पर पड़ा है और कोई उसे रोटी देने के बजाय बांसुरी बजाकर “संस्कृति” खिला रहा है। आज वही बांसुरी बदलकर बयान बन गई है। फर्क बस इतना है कि अब भूख की जगह गर्मी है, और रोटी की जगह छांव और पानी।

अगर सच में इतना भरोसा है प्याज पर, तो क्यों न इसे नीति बना दिया जाए? महाराज को मोदी जी को पत्र लिखना चाहिए कि भारत सरकार के India Meteorological Department को निर्देशित किया जाए कि हर हीट वेव अलर्ट के साथ यह भी घोषित करे “आज का तापमान 46 डिग्री, कृपया अपने साथ एक प्याज रखें।” स्कूलों में मिड-डे मील की जगह प्याज बाँटा जाए। अस्पतालों में दवाइयों के साथ प्याज दिया जाए। और सरकार कहे देखिए, हमने समाधान दे दिया और महाराज को इतनी बड़ी समस्या के समाधान के लिए भारत रत्न दे दिया जाए.

असल में हिंदुस्तान का मज़दूर इस देश समस्याओं की से नहीं, बल्कि उसके चुने हुए नुमाइंदो के मज़ाक से जूझ रहा है। यहाँ हर गंभीर समस्या को एक हल्के बयान में बदल दिया जाता है, और फिर उस बयान पर ताली बजाई जाती है। और इस पूरे दृश्य में सबसे दुखद बात यह नहीं है कि किसी ने “प्याज” कहा। सबसे दुखद बात यह है कि कोई उसे गंभीरता से सुन भी रहा है। क्योंकि जब एक देश अपने सबसे बड़े संकट का जवाब एक सब्ज़ी में ढूँढने लगता है, तब समझ लीजिए कि समस्या गर्मी नहीं है समस्या सोच की है।

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